पीएम मोदी के जन्मदिन का ये तोहफा देश को बड़ा महंगा पड़ा है

मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले का छोटा बड़दा गांव. यहां नर्मदा बचाओ आंदोलन की संस्थापक मेधा पाटकर के साथ 36 महिलाएं

मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले का छोटा बड़दा गांव. यहां नर्मदा बचाओ आंदोलन की संस्थापक मेधा पाटकर के साथ 36 महिलाएं चार दिनों से जल सत्याग्रह कर रही हैं. सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने के विरोध में सत्याग्रह कर रही इन महिलाओं की चमड़ी पानी की वजह से उतर रही है और उनमें खून आने लगा है. इसके बाद भी महिलाएं डटी हुई हैं और मांगे नहीं माने जाने पर जल समाधि की बात कह रही हैं.

 

सरदार सरोवर बांध के विरोध में जल सत्याग्रह कर रही महिलाएं जल समाधि लेने की बात कह रही हैं.

दूसरी तस्वीर सरदार सरोवर बांध की है. ये बांध नर्मदा नदी पर बना है. गुजरात के नवगांव जिले के पास बना यह बांध दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध है. 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बांध का लोकार्पण किया है. इस बांध से गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्यप्रदेश को फायदा होने वाला है. बांध के लोकार्पण से गुजरात के लोग खुशियां मना रहे हैं, तो मध्यप्रदेश के लोगों में मातम पसरा हुआ है.

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने 67वें जन्मदिन पर सरदार सरोवर बांध का लोकार्पण किया.

दो तस्वीरें और अलग-अलग तर्क. एक अच्छी तस्वीर जिसके पक्ष में तमाम बातें हैं. एक मार्मिक तस्वीर, जिसमें लोग जान देने को तैयार बैठे हैं. दोनों की वजह एक है सरदार सरोवर बांध. पहले इस बला के बारे में ही जान लेते हैं.

1. देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नर्मदा नदी पर बांध बनाने की पहल 1945 में ही की थी.
2.मुंबई के इंजीनियर जमदेशजी एम वाच्छा ने सरदार सरोवर डैम का प्लान बनाया, लेकिन इसकी शुरुआत में ही 15 साल लग गए.
3. 5 अप्रैल, 1961 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसकी नींव रखी.
4.56 साल में 65 हजार करोड़ रुपये की लागत से ये बांध तैयार हुआ है.
5. बांध की ऊंचाई 138.68 मीटर और लंबाई 1,210 मीटर है. पहले इस बांध की ऊंचाई 121.92 मीटर थी. 2014 में मोदी सरकार ने इसकी ऊंचाई 138.62 मीटर करने को मंजूरी दी थी.
6. ये बांध देश का सबसे ऊंचा और दुनिया का दूसरा सबसे ऊंचा बांध है.
7. इसमें 30 दरवाजे हैं. हर दरवाजे का वजन 450 टन है. एक दरवाजे को बंद करने में एक घंटे लगते हैं.

 

बांध पर लगी लाइटें पानी के ओवर फ्लो को भी दिखाती हैं.

8. बांध में 4.73 मिलियन क्यूसेक पानी इकट्ठा किया जा सकता है.
9. बांध पर गुलाबी, सफेद और लाल रंग के 620 एलईडी बल्ब लगे हैं. 120 बल्ब बांध के 30 गेट पर लगे हैं.
10 बांध बनाने में 86.20 लाख क्यूबिक मीटर कंक्रीट लगा है. मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो इतने कंक्रीट से पृथ्वी से चंद्रमा तक सड़क बनाई जा सकती थी.

 

सरदार सरोवर बांध का नुकसान, जो होने वाला है

बांध के गेट खुलने से मध्यप्रदेश के गांवों में पानी भरना शुरू हो गया है.

जहां एक इंसान के जीवन की कीमत नहीं लगाई जा सकी है, वहां इस बांध की वजह से 192 गांवों के 40 हजार से ज्यादा परिवारों के डूबने का खतरा है. 40 हजार परिवार यानी करीब पांच लाख लोग. ये सभी गांव पूरी तरह से पानी में डूब जाएंगे. गांव के लोगों को अपना घर-परिवार, खेत-खलिहान सब छोड़ना होगा. ये सभी परिवार एक ही राज्य मध्यप्रदेश के हैं, जहां बांध से होने वाला फायदा सिर्फ बिजली के तौर पर मिलेगा. इसके अलावा गुजरात के 19 और महाराष्ट्र 33 गांवों का नक्शा ही मिट जाएगा. अगर पांच लाख से ज्यादा लोगों को बांध की वजह से घर छोड़ना पड़े तो ये नुकसान किसी भी होने वाले फायदे से ज्यादा बड़ा है.

बांध से नुकसान, जो हो चुका है

गांवों में पानी भरने की वजह से लोगों को घर छोड़कर जाना पड़ रहा है.

सरदार सरोवर बांध के डूब क्षेत्र में आने वाले गांवों को खाली करवा दिया गया है. धार और बड़वानी जिलों में पानी का जल स्तर बढ़ने से निचले इलाकों में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है. इसके अलावा अलीराजपुर और खरगोन जिलों के गांवों में भी पानी भरने लगा है. प्रदेश में बांध से विस्थापित लोगों के लिए 3,000 अस्थायी आवास और 88 स्थायी पुनर्वास स्थल बनाए गए हैं.

सरदार सरोवर बांध के फायदे जो सरकार गिना रही है

 

सरदार सरोवर बांध दुनिया का दूसरा सबसे ऊंचा बांध है.

1. बांध की वजह से 10 लाख किसानों और चार करोड़ आम आदमी को फायदा होगा.
2.सबसे ज्यादा फायदा गुजरात को होगा. 15 जिलों के 3137 गांव की 18.45 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई की जा सकेगी.
3. गुजरात के हजारों गांवों के साथ महाराष्ट्र के 37, 500 हेक्टेयर इलाके तक सिंचाई की सुविधा होगी.
4. राजस्थान के दो सूखा प्रभावित जिले जालौर और बाड़मेर तक 2,46,000 हेक्टेयर जमीन की प्यास बुझेगी.
5. गुजरात के 9,633 गांवों तक पीने का पानी पहुंचेगा.
6. इसके अलावा और दो राज्यों के 9000 गांवों को फायदा पहुंचेगा.

 


7.बांध की जल भंडारण क्षमता अब 4,25,780 करोड़ लीटर हो चुकी है. ये पानी पहले बह कर समुद्र में चला जाया करता था.
8. 2016-17 के दौरान बांध से 320 करोड़ यूनिट बिजली पैदा की गई. ज्यादा पानी जमा होने से 40 फीसदी ज्यादा बिजली पैदा होगी.
9. बिजली का सबसे अधिक 57% हिस्सा मध्य प्रदेश को मिलेगा. महाराष्ट्र को 27% और गुजरात को 16% बिजली मिलेगी.

आंदोलनों की वजह से 56 साल तक बचे रहे लोग

 

बांध के विरोध में हुए आंदोलनों ने समय-समय पर लोगों का ध्यान इस ओर खींचा है.

सरदार सरोवर बांध को बनने में 56 साल लग गए. इसके पीछे आंदोलनों का एक लंबा इतिहास रहा है. इन आंदोलनों ने ही अब तक लोगों को डूबने से बचाए रखा था, लेकिन 17 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी के लोकार्पण के साथ ही ये बांध अब अपने फायदे और नुकसान के साथ लोगों के सामने है.

जुलाई 1993 : टाटा सोशल साइंसेज ने सात साल की रिसर्च के बाद एक पेपर सामने रखा, जिसमें कहा गया कि बांध बनने से लोग विस्थापित हुए हैं और उनके लिए नए ठिकाने नहीं बन पाए हैं. इसलिए काम रोक दिया जाए.
अगस्त 1993 : केंद्र सरकार ने सिंचाई मामलों के सलाहकार के नेतृत्व में पांच सदस्यीय कमिटी बनाई.
दिसम्बर 1993: केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय ने सरदार सरोवर परियोजना में पर्यावरण संबंधी नियमों की अनदेखी की बात कही.
जनवरी 1994: प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने परियोजना को रोकने का आदेश दिया.
मार्च 1994: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से कहा कि राज्य सरकार के पास पुनर्वास के साधन नहीं हैं. केंद्र सरकार मदद करे.
अप्रैल 1994: विश्व बैंक की टीम ने माना कि पुनर्वास का काम ठीक से नहीं हो रहा है.
जुलाई 1994 : केंद्र सरकार की समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी. पुनर्वास केंद्रों में पानी पीने से 10 लोग मर गए.


नवंबर 1994: बांध बनाने का काम शुरू हो गया. विरोध में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने भोपाल में धरना शुरू किया.
दिसम्बर 1994: मध्य प्रदेश के विधायकों की एक समिति ने माना कि पुनर्वास में गड़बड़ियां हुई हैं.
जनवरी 1995: मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. कोर्ट ने बांध की ऊंचाई तय करने के लिए रिसर्च करने को कहा.
जून 1995: गुजरात सरकार ने नर्मदा नदी पर एक नई परियोजना कल्पसर शुरू कर दी .
नवंबर 1995 : सुप्रीम कोर्ट ने सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने की इजाजत दी.
जनवरी 1996 : पुनर्वास और ज़मीन की मांग को लेकर मेधा पाटकर के नेतृत्व में धरना-प्रदर्शन शुरू हुआ.
अक्टूबर 1997: बांध बनाने वालों ने अपना काम तेज किया.
जनवरी 1998: सरकार ने काम रोक दिया.
अप्रैल 1998: दोबारा बांध बनना शुरू हुआ. विरोध प्रदर्शन हुए.
मई-जुलाई 1998: प्रदर्शनकारियों ने नाकेबंदी कर निर्माण सामग्री को बांधस्थल तक पहुंचने से रोका.
दिसम्बर 1999: दिल्ली में एक विशाल सभा हुई जिसमें नर्मदा घाटी के विस्थापित शामिल हुए.
मई 2002 : नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण को बांध की ऊंचाई 95 मीटर (312 फीट) तक बढ़ाने को मंजूरी मिली.
मार्च 2004 : प्राधिकरण ने 15 मीटर और ऊंचाई बढ़ाने की मंजूरी दी. कुल ऊंचाई 110 मीटर हो गई.
मार्च 2006 : नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण ने बांध की ऊंचाई 110.64 मीटर से 121.92 मीटर (400 फीट) बढ़ाने को हरी झंडी दी.
अगस्त 2013 : नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण ने बांध की ऊंचाई 138.68 मीटर तक कर दी.
मई 2014: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांध की ऊंचाई को मंजूरी दे दी.
सितंबर 2017 : सरदार सरोवर बांध आधिकारिक तौर पर खोल दिया गया.

25 साल से आंदोलन कर रही हैं मेधा पाटकर

 

मेधा पाटकर 1989 से ही इस बांध के विरोध में देश के अलग-अलग हिस्सों में आंदोलन करती रही हैं.

सरदार सरोवर बांध शुरू से ही विवादों में रहा है. मध्यप्रदेश इस बांध के विरोध का नेतृत्व नर्मदा घाटी नवनिर्माण समिति कर रही थी. वहीं महाराष्ट्र में इस प्रोजेक्ट का विरोध नर्मदा घाटी धरंग्रस्था समिति कर रही थी. आंदोलन को मजबूती देने के लिए 1989 में दोनों संस्थाएं एक साथ आ गईं और एक नई संस्था बनी, नर्मदा बचाओ अंदोलन. इसके नेतृत्व का जिम्मा संभाला मेधा पाटकर ने. शुरुआती आंदोलनों के बाद मेधा पाटकर ने 1991 में भूख हड़ताल की, जो असफल रही. इसके बाद असहयोग आंदोलन की शुरुआत की गई, जिसके तहत लोगों से टैक्स न भरने को कहा गया. गांवों में सरकारी अधिकारियों की एंट्री बंद कर दी गई. 25 साल से लंबे समय तक चल रहे आंदोलन के दौरान मेधा पाटकर ने कई बार भूख हड़ताल की, पुलिस की लाठियां खाईं, जेल गईं और अब वो मध्यप्रदेश में 36 महिलाओं के साथ जल सत्याग्रह पर बैठी हैं.

मेधा पाटकर के साथ इन आंदोलनों में बाबा आम्टे ने सक्रिय भूमिका निभाई है.

इस आंदोलन के एक और नायक रहे हैं बाबा आमटे. 1989 में आमटे ने 60000 लोगों के साथ धरना प्रदर्शन किया.1990 में नर्मदा बचाओ आंदोलन के तहत 5 दिन तक दिल्ली में प्रधानमन्त्री आवास के बाहर धरना प्रदर्शन किया. इस आंदोलन का नारा था “विकास चाहिए विनाश नहीं” और “कोई नहीं हटेगा बांध नहीं बनेगा”. जून 1991 में वर्ल्ड बैंक ने परियोजना की समीक्षा के लिए मोर्स कमीशन भेजा, जिसकी रिपोर्ट में मानवाधिकारों के उल्लंघन से लेकर पर्यावरण के साथ हो रहे खिलवाड़ तक की बात सामने आई. वर्ल्ड बैंक ने 250 मिलियन डॉलर की सहायता वापस ले ली, लेकिन केंद्र सरकार ने बांध बनाना जारी रखा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकार्पण के बाद 17 सितंबर से ये बांध पूरी ताकत से काम करने लगा है.