फ़िल्म रिव्यू : जग्गा जासूस

“पिक्चर शुरू, हो गई पिक्चर शुरू पिक्चर में आजू-बाजू वालों का ख्याल रखना पिक्चर में सामने की कुर्सी पर न पांव रखन

ऐसे ही शुरू हुई थी बर्फ़ी. अनुराग बासु की पिछली फ़िल्म. 5 साल पहले.  बर्फ़ी, एक कमाल की फ़िल्म. अनुराग बासु का बेहतरीन काम. रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा के जीवन की सबसे अच्छी ऐक्टिंग. प्रीतम का सबसे अच्छा म्यूज़िक और अनुराग बासु का कमाल का दिमाग. और अब आई है जग्गा जासूस.

फ़िल्म शुरू होती है तो बर्फ़ी ही बर्फ़ी याद आती है. पहले तो वो ‘पिक्चर शुरू’ वाला गाना. और फिर फ़िल्म का पहला शॉट. एक कोने एक पेड़ और बाकी का खाली फ़्रेम. बंगाली आदमी जैसे ही आता है, लगता है ये तो बर्फ़ी पार्ट 2 है. लेकिन फिर प्लेन से पेटियां गिरती हैं और उनमें होते हैं हथियार. और याद आता है 1995 में पुरुलिया में गिराए गए हथियार. एक प्लेन उड़ा, और पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में उसने कुछ पेटियां उतारीं. पेटियों में थीं एके-47 बंदूकें और गोलियां. फ़िल्म जग्गा जासूस यहीं से शुरू होती है.

फ़िल्म में रणबीर कपूर एक स्टूडेंट हैं. जग्गा. एक हकला स्टूडेंट. बोलने में समस्या होती है इसलिए बचपन में बोलता ही नहीं था. एक आदमी आया – टूटी फूटी. फूटी किस्मत साथ में लाया और जग्गा को गाते-गाते बोलना सिखाया. जग्गा बोलने लगा और कई केस के राज़ खोलने लगा. उसके पास महीन नज़र है. नज़र की मदद के लिए एक चश्मा है. बाल एक किनारे से हवा में रहते हैं. और जग्गा जासूस बन जाता है. गाते-गाते केस सॉल्व कर देता है. लेकिन एक केस वो सॉल्व नहीं कर पाता है. टूटी-फूटी गायब हो गया है. उसे मिल नहीं रहा है.

फिर आती है श्रुति सेनगुप्ता. कटरीना कैफ़. इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट है. मंगेतर को नक्सलियों ने साल भर पहले झारखंड में मार दिया था. अब वो अकेली काम करती है. आज भी अपने ‘स्वर्गवासी बॉयफ्रेंड’ का बर्थडे मनाती है. जग्गा टूटी-फूटी को ढूंढने में उससे मदद मांगता है.

फ़िल्म में रणबीर और कटरीना के अलावा शाश्वत चटर्जी और सौरभ शुक्ला भी हैं. शाश्वत चटर्जी का नाम जिसके लिए अनसुना है उसे कहानी का बॉब बिस्वास याद कर लेना चाहिए. वो आदमी जो “एक मिनट” कहके धांय से गोली चला देता था. जिसने बिद्या को मेट्रो ट्रेन के आगे लगभग गिरा दिया था. और सौरभ शुक्ल तो सौरभ शुक्ल हैं. सत्य का कल्लू मामा आज भी बियर की बोतल पकड़े, बंडी पहने मुझसे बातें करता है.

कुछ फ़िल्में हीरो चलाते हैं, कुछ हीरोइनें चलाती हैं. कुछ गाने चलाते हैं. इस फ़िल्म को अनुराग बासु चला रहे हैं. ये फ़िल्म कई फ़िल्म बनाने वालों का सपना हो सकती है. ऐसा काम करना हज़ारों आर्टिस्ट्स का सपना होगा. और उसे अनुराग बासु ने हमारे सामने ला दिया है. कहानी, लिखावट, आवाजें, लाइट्स और रंग से लैस फ़िल्म. जग्गा जासूस अनुराग बासु का एक्सपेरिमेंट है. और साथ ही बहुत बड़ा रिस्क भी. फ़िल्म में 80% डायलॉग्स गाते हुए बोले जा रहे हैं. रह-रह कर जॉनी डेप की ‘स्वीनी टॉड’ फ़िल्म की याद आती है. फ़िल्म में जॉनी डेप भी अपने डायलॉग्स को गाने की शक्ल देकर बोलते हैं. हालांकि वहां वजह हकलाहट नहीं थी.

फ़िल्म में बहुत महीन बातें भी रखी गई हैं. एक जगह ऐसी आती है जहां दरवाज़े पर लटके नीम्बू और मिर्ची की मदद से कहीं पर निगाहें और कहीं पे निशाना वाला खेल खेला गया है. बच्चे खड़े होकर गाते हैं, “दरवाज़े पर है नीम्बू मिर्ची, हम तो हैं सेफ़.” वहां आत्महत्या करते हुए किसान, देश-दुनिया में बढ़ रहे आतंकवाद और कट्टरपंथ, जैसी बातों का हवाला दिया जाता है और फिर हमारा दोगलापन सामने परोस दिया जाता है जहां हम अपने घर के दरवाज़ों पर नीम्बू-मिर्ची लटकाकर, कम्बल में दुबककर सो जाते हैं. बाकि बातों के लिए हम कहते हैं “हमको उससे क्या?”

फ़िल्म के बारे में जो एक बात गड़बड़ जा सकती है वो ये है कि प्लॉट में कोई बहुत ज़्यादा मजबूती नहीं है. भयानक एजेंट्स और सैनिकों और उनकी बंदूकों से निकली सैकड़ों गोलियों से जग्गा और श्रुति बचते रहते हैं. श्रुति की बदकिस्मती की एक भयानक सीरीज़ की बदौलत ये दोनों टूटी-फूटी तक पहुंचते हैं. और ये थोड़ा बचकाना लगता है. बचकाने से याद आया, ‘स्वीनी टॉड’ के अलावा ‘टिनटिन’ भी खूब  याद आता है. जग्गा के बालों की वजह से. टिनटिन की ही तरह जग्गा के बाल भी ग्रेविटी को मुंह चिढ़ाते हुए ऊपर हवा में रहते हैं.

फ़िल्म में आने वाले गाने खूब मज़ा देते हैं. वो गाने जो डायलॉग्स की जगह लिए बैठे हैं. बैकग्राउंड स्कोर फ़िल्म की चौथाई जान है. एक चौथाई रणबीर कपूर भी हैं और बाकी आधी जान इस फ़िल्म के विज़ुअल्स में बसती है. फ़िल्म में आंखों के लिए भरपूर ठंडक है. लाइट्स का इससे अच्छा इस्तेमाल इससे पहले अनुराग कश्यप ने ‘काला रे’ गाने की ठीक शुरुआत में फैज़ल खान के सिगरेट जलाते वक़्त उसके पीछे एक हल्की पीली लाइट जलाकर किया था. या शायद उन्हीं की शॉर्ट फ़िल्म ‘लास्ट ट्रेन टु महाकाली’ की जेल में किया गया था.

ये फ़िल्म देखी जानी चाहिए. एक आध हिस्सों पर ऐसा मालूम भी देता है कि फ़िल्म हल्की हो रही है लेकिन उसके आगे जो है उसके लिए डटे रहना चाहिए. जमे रहना चाहिए. ये फ़िल्म यकीनन हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी तरह की पहली फ़िल्म है. आप लाख दलीलें दे दीजिये कि ये हिस्सा उस फ़िल्म से मिलता है और वो हिस्सा उस फ़िल्म से लेकिन अनुराग बासु ने जो बनाने की कोशिश की है उसके लिए उन्हें खूब शाबाशी मिलनी चाहिए. ये वो फ़िल्म है जिसका बनना ज़रूरी था. ये फ़िल्म वो फ्रेश हवा है जिसे लेने के लिए ऑफिस में काम करने वाला मजदूर 5 मिनट का ब्रेक लेकर, काम रोककर बाहर निकलता है. अनुराग ने ये एक्सपेरिमेंट करना चाहा और किया भी, इसके लिए उन्हें थैंक यू कहा जाए.

फ़िल्म देखी जाए. शुतुरमुर्ग, ट्रेन, प्लेन, टिनटिन वगैरह देखकर बच्चों वाली फ़िल्म लगेगी मगर ऐसा है नहीं. अच्छी और/या नई चीज़ों से कोई संकोच या अलर्जी हो तो कोई बात नहीं है.

बाकी, जैसा आप चाहें.