मिलिट्री यूनिफॉर्म पहने बोस ने गांधी के बारे में वो कहा, जो सबको जानना चाहिए

6 जुलाई 1944. आजाद हिंद रेडियो पर ब्रॉडकास्ट जाने वाला था. भारत की आजादी के लिए लड़ रही आजाद हिंद फौज से लेकर हिंदुस

6 जुलाई 1944. आजाद हिंद रेडियो पर ब्रॉडकास्ट जाने वाला था. भारत की आजादी के लिए लड़ रही आजाद हिंद फौज से लेकर हिंदुस्तान में उनके दीवानों के लिए ये बहुत बड़ा मौका था. सुभाष चंद्र बोस ने तय किया था कि आजादी लड़कर लेंगे. गांधी से असहमत हुए उनको 5 साल हो चुके थे. इस दौर को आज भी याद किया जाता है और कहने वाले बोस और गांधी को एक-दूसरे के सामने खड़ा करते हैं. पर ऐसा नहीं था.

फौज के रेडियो रूम में गहमा गहमी थी. लोग खुसुर फुसुर कर रहे थे कि अब तो आजादी की लड़ाई गांधी से मुक्त है. हम नहीं मानते उनके आदर्श. भारत छोड़ो आंदोलन से क्या हासिल हुआ. लोगों को मार पड़ी और क्या मिला. लोगों के चेहरों पर गुस्सा और आग थी.

फिर हल्ला हुआ कि सुभाष बाबू पहुंच गये. लोग शांत हो गए. सांस रोके देखते रहे. उस दिन सुभाष ने मिलिट्री यूनिफॉर्म पहनी थी. उनको देखते ही नजदीकियों ने कुछ कहना चाहा, कुछ सलाह देनी चाही. पर सुभाष बाबू की नजरों ने सबको चुप करा दिया.

सुभाष बाबू ने राष्ट्र के नाम बोलना शुरू किया- भारत की आजादी की आखिरी लड़ाई शुरू हो चुकी है. आजाद हिंद फौज हिंदुस्तान की धरती पर लड़ रही है. सारी दिक्कतों के बावजूद आगे बढ़ रही है. ये हथियारबंद संघर्ष तब तक चलेगा जब तक कि ब्रिटिश राज को देश से उखाड़ नहीं देंगे. दिल्ली के वॉयसराय हाउस पर तिरंगा फहरेगा.

सुभाष बाबू ने पॉज लिया. सबको लगा कि अब कुछ नारे लगेंगे. पर ऐसा नहीं हुआ. सुभाष बाबू ने कहा- राष्ट्रपिता, हिंदुस्तान की आजादी की लड़ाई में हम आपका आशीर्वाद मांगते हैं.

सबकी आंखें नम थीं. सुभाष बाबू ने बता दिया था कि गांधी ही सेनापति हैं. बाकी लोग सैनिक. जिनको गांधी और सुभाष में तुलना करनी होती है, उनको ये जरूर जानना चाहिए.

 

        हारे हुए सैनिकों को लेकर बनाई गई हिंदुस्तान की अपनी सेना

आजाद हिंद फौज (फोटो: Youtube)

फरवरी 1942 में सिंगापुर के मोर्चे पर ब्रिटिश सेना की हार को विंस्टन चर्चिल ने “ब्रिटिश इतिहास का सबसे बड़ा डिजास्टर” कहा था. उस वक्त 1,35000 भारतीय और एंजेक (ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड) और ब्रिटिश सैनिकों ने महज 30,000 जापानी सैनिकों के खिलाफ घुटने टेक दिए थे. 90 हजार ब्रिटिश इम्पीरियल आर्मी के सैनिक युद्ध बंदी बना लिए गए. इसमें से आधे से ज्यादा सैनिक भारतीय थे. भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश सैनिकों से अलग रखा गया. 17 फरवरी को भारतीय सैनिकों को आदेश दिया गया कि वो पास ही के फुटबॉल फील्ड ओल्ड रेसकोर्स में इकठ्ठा हो जाएं.

जब एक जापानी अफसर ने हिंदुस्तानियों को कहा भाई

जापानी अफसर मोजर फुजिवारा ने भारतीय सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा कि आप भारतीय सैनिकों ने हमारे सामने आत्मसमर्पण कर दिया है. लेकिन हम भी आपकी तरह एशियन हैं. इस लिहाज से हम भाई हुए. एक भाई दूसरे भाई को बंदी कैसे बना सकता है. आपकी मातृभूमि पर जो कि बुद्ध और गांधी की धरती है, आज अपनी आजादी के लिए संघर्ष चल रहा है. आप लोगों को भी इस लड़ाई के लिए आगे आना चाहिए. आज से आप लोग आजाद सैनिक हैं. अब मैं आप लोगों को कैप्टन मोहन सिंह के हवाले करता हूँ, जो कि इंडियन नेशनल आर्मी के कमांडिंग अफसर हैं.

भारतीय सैनिक जापान में बंधक बना लिए गए थे.

मोजर फुजीवारा जो भी कहें लेकिन जापानी सैनिकों का भारतीय सैनिकों के प्रति रवैय्या दोयम दर्जे का ही रहा. जब इस बात पर कैपट मोहन सिंह ने एतराज जताया तो उन्हें जापानी सेना ने फिर से गिरफ्तार कर लिया. इस तरह आजाद हिन्द फ़ौज बिना सेनापति वाली सेना में तब्दील हो गई. लेकिन इस सेना का असल सेनापति तो हजारों मील दूर बर्लिन में बैठा हुआ था और हताश हो रहा था.

हिटलर को समझाने की कोशिश में लगे रहे

जर्मनी में हिटलर के साथ नेताजी

सुभाष चंद्र बोस बर्लिन में हिटलर को यह समझाने में लगे हुए थे कि वो भारतीय युद्ध बंदियों की वफ़ादारी को बदल सकने की कूवत रखते हैं. वो भारतीय युद्ध बंदियों के जरिए भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को दफ़न कर देंगे. हिटलर के मन में भारत को आजाद करवाने के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं थी. जब हिटलर ने सोवियत यूनियन पर धावा बोला तो सुभाष समझ गए कि बर्लिन में बैठे रहने से कुछ नहीं होगा. आखिरकार हताश सुभाष ने तय किया कि उन्हें अपने मिशन के लिए कोई और वैकल्पिक योजना देखनी पड़ेगी.

अपने सहयोगी आबिद हसन के साथ नेता जी 8 फरवरी 1943 को जर्मन नौसेना की एक पनडुब्बी में सवार होकर जापान के लिए निकल पड़े. मेडागास्कर में इस पनडुब्बी ने बोस को जापानी पनडुब्बी के हवाले किया. 90 दिन की लंबी यात्रा के बाद वो सुमात्रा द्वीप पहुंचे जोकि उस समय जापानी सेना के कब्जे में था. सुमात्रा से उन्होंने टोक्यो के लिए उड़ान भरी ताकि वो जापानी सरकार को अपनी योजना के लिए मना सकें. 11 मई को बोस टोक्यो पहुंचे और जापानी प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो से मिले. तोजो को बोस की योजना पसंद आई और वो उन्हें मदद देने के लिए तैयार हो गए. दरअसल युद्ध में उतरने के लिए जापान जिस तर्क का इस्तेमाल किया था उसका नाम था, “एशिया एशियाई लोगों का है.” ऐसे में भारत में ब्रिटिश राज के खिलाफ एक राष्ट्रवादी हथियारबंद संघर्ष को मदद देना उसके इस तर्क को वैधता प्रदान करता था. यहां कुछ महीने बिताने के बाद वो 2 जुलाई 1943 को सुभाष बाबू सिंगापुर पहुंचे.

फिर सुभाष बाबू ने काम को अंजाम देना शुरू कर दिया

नेताजी को सुनने के लिए दूसरे देश के सैनिक भी आते थे.

दो दिन बाद माने 4 जुलाई 1943 को सिंगापुर की सबसे ऊंची इमारत ‘कैफे सिनेमा’ में नेताजी की जनसभा रखी गई. आजाद हिन्द फ़ौज के सैनिकों के अलावा मलेशिया में रह रहे भारतीय मूल के लोग भी इस मीटिंग में पहुंचे. इस मीटिंग में रास बिहारी बोस ने सुभाष बाबू को आजाद हिंद फ़ौज का सुप्रीम कमांडर घोषित किया. ब्रिटिश उपनिवेश होने की वजह से मलाया (मलेशिया) और बर्मा में भारतीय मूल के मजदूरों और व्यापारियों की एक बड़ी आबादी रहा करती थी. सुभाष ने भारतीय मूल के लोगों से इस लड़ाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने की बात कही. यह वही सभा थी जब मंच पर खड़े सुभाष कह रहे थे

“हमारे रास्ते में भूख, प्यास की तकलीफें आएंगी. हमारे में से कितने आदमी बचेंगे, यह कहना मुश्किल है. लेकिन हम भारत को आजाद करवा कर रहेंगे.” 

नेताजी के इस भाषण ने लोगों को बांध लिया. 16,300 लोगों से शुरू हुई आजाद हिन्द फ़ौज की तादाद जल्द ही 50 हजार के करीब पहुंच गई. तुरंत ही करीब एक लाख नागरिक आजाद हिन्द फ़ौज का हिस्सा बनने के लिए तैयार थे.

आजाद हिंद फ़ौज को मुख्य रूप से पांच अलग-अलग गुरिल्ला रेजिमेंट में बांटा गया था

1 सुभाष ब्रिगेड– इसका नेतृत्व कर रहे थे कर्नल शाह नवाज़ खान
2 गांधी ब्रिगेड– कर्नल इनायत कियानी के नेतृत्व में
3. आजाद ब्रिगेड– कर्नल गुलजारा सिंह
4 नेहरू ब्रिगेड– ले. कर्नल गुरुबक्श सिंह ढिल्लो
5 झांसी की रानी रेजिमेंट – कैप्टन लक्ष्मी सहगल इसका नेतृत्व कर रही थीं. यह महिलाओं की ब्रिगेड थी.

इसके अलावा स्पेशल ऑपरेशन के लिए बहादुर ग्रुप बनाया गया था. इस ग्रुप का काम भारतीय सीमा में घुस कर छोटी-छोटी गुरिल्ला कार्रवाईयों को अंजाम देना था. नागरिक तमाम जोश के बावजूद युद्ध के मोर्चे पर नहीं भेजे जा सकते थे. इसके लिए आजाद स्कूल ऑफ़ मिलिट्री ट्रेनिंग की स्थापना की गई. यहां ट्रेनिंग की जिम्मेदारी सौंपी गई हबीब-उर-रहमान को. इसके अलावा आने वाले युद्ध में ब्रिटिश एयरफ़ोर्स की चुनौती से निपटने के लिए सुभाष चंद्र बोस ने 45 भारतीय नौजवानों को खुद चुना. इन्हें टोक्यो में फाइटर प्लेन उड़ाने की ट्रेनिंग के लिए भेजा गया. नौजवान पायलट्स के इस जत्थे को बाद में ‘टोक्यो बॉयज’ के नाम से जाना गया.

आजाद हिंद फौज ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया था.

अक्तूबर 1943 में सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द सरकार या ‘अर्जी हुकूमत ए आजाद हिन्द’ का गठन हुआ. 23 अक्टूबर 1943 को इस सरकार ने ब्रिटेन और अमेरिका के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया. हालांकि आजाद हिन्द फ़ौज के पहले मिशन पर जाने में अभी पांच महीने के करीब इंतजार करना था.

ऑपरेशन यू-गो शुरू हुआ, एकदम स्टाइल में

1942 में जब जापानी सेना ने बर्मा पर अपना कब्ज़ा जमाया, उस वक़्त उन लोगों ने भारतीय इलाकों में घुसने की योजना तैयार की थी. लेकिन आगे आते मानसून के मद्देनजर यह प्लान उस समय छोड़ दिया गया था. आजाद हिन्द फ़ौज और जापानी सेना ने मिलकर फिर से इस प्लान को अमल में लाना शुरू किया. आजाद हिन्द फ़ौज के अफसरों को पता था कि उनके संसाधन सीमित हैं. इसलिए उनकी रणनीति यह थी कि किसी भी तरह से नागा पहाड़ियों को पार करके मैदानी इलाकों में घुस जाना है. सुभाष चंद्र बोस को उम्मीद थी कि भारतीय जनता इस सेना का हर चंद तरीके से समर्थन करेगी. ऐसे में इस सेना को बाद की लड़ाई सिर्फ गुरिल्ला दस्ते की तरह से लड़नी थी. उम्मीद थी कि प्रचंड जन समर्थन और गुरिल्ला युद्ध के जरिए वो भारत से अंग्रेजों को भगा देंगे.

मोर्चे पर थी दो डिवीजन

मार्च 1944 में आजाद हिन्द फ़ौज के दो डिवीजन मोर्चे पर थे. पहली डिवीजन में चार गुरिला बटालियन थीं. यह अराकान के मोर्चे पर अंग्रेज सेना से मोर्चा ले रही थी. इसमें से एक बटालियन ने वेस्ट अफ्रीकन ब्रिटिश डिवीजन की घेराबंदी को तोड़ते हुए मोवडोक पर कब्ज़ा जमा लिया. वहीं बहादुर ग्रुप की एक यूनिट जिसका नेतृत्व कर्नल शौकत अली कर रहे थे मणिपुर के मोइरंग पहुंच गई. मोइरंग जहां की पहाड़ियां आज भी एक यतीम खाम्बा और एक राजकुमारी थोइबी के जुनूनी इश्क की गवाही देती हैं, 18 अप्रैल 1944 में आजाद हिन्द के कदमताल सुन रही थीं. 19 अप्रैल की सुबह कर्नल शौकत अली ने मोइरंग में तिरंगा झंडा फहराया.

सुभाष बाबू का इंटरनेशनल एडवेंचर खत्म हुआ पर बहुत कुछ छोड़ गया

आजाद हिंद फौज की महिला विंग के साथ नेताजी (फोटो: Cultural India)

इधर जापान की 31 वीं डिविजन के साथ कर्नल शाहनवाज के नेतृत्व में आजाद हिन्द फ़ौज की दो बटालियन ने चिंदविक नदी पार की. यहां से ये लोग लोग इम्फाल और कोहिमा की तरफ बढ़े. इस ऑपरेशन के दौरान जापानी सेना के कमांडर और भारतीय अधिकारियों के बीच कहासुनी ने स्थिति को बिगाड़ दिया. ऐसे विपरीत हालात में मौसम ने भी आजाद हिन्द फ़ौज का साथ छोड़ दिया. मानसून हर साल के मुकाबले जल्दी शुरू हो गया. भारी बारिश ने पहाड़ी सड़कों को कीचड़ के दरिया में तब्दील कर दिया. जापानी सेना इस अभियान से पीछे हटने लगी. ऐसे में आजाद हिन्द फ़ौज की सप्लाई लाइन पूरी तरह से ध्वस्त हो गई. मई के अंत तक आजाद हिन्द फ़ौज की सभी बटालियन रास्ते भर इम्पीरियल एयरफ़ोर्स से पिटते-पिटाते वापस बेस कैंप की ओर लौटने लगी.

मार्च में जो आजाद हिन्द फ़ौज आक्रामक तरीके से भारतीय क्षेत्रों में आक्रमण कर रही थी, अगस्त आते-आते बर्मा में अपने आधार क्षेत्र को बचाने में लग गई. इम्पीरियल सेना के तोप खानों और लड़ाकू विमानों ने जंग का रुख मोड़ दिया था. कोहिमा से वापसी के बाद भारत को आजाद करवाने का सपना लगभग दफ़न हो चुका था. जापान की स्थिति और भी ख़राब थी. इसलिए उनसे कोई उम्मीद करना बेकार था. इस हताशा भरे दौर में भी सुभाष बाबू ने रेडियो रंगून के जरिए गांधी जी और देश को संबोधित किया था.

आजाद हिंद फौज को लड़ाई में मात खाने के बाद रंगून में पीछे हटना पड़ा.

अगले एक साल तक आजाद हिन्द फ़ौज ब्रिटिश इम्पीरियल आर्मी के किसी भी मोर्चे पर सीधी लड़ाई से बचने की कोशिश करती रही. मंडला और माउन्ट पोपा में बुरी तरह मात खाने के बाद आजाद हिन्द फ़ौज को रंगून की तरफ पीछे हटना पड़ा. सैनिकों के बीच हताशा की भावना थी. अप्रैल 1945 तक आजाद हिन्द फ़ौज के कई लड़ाके बढ़ती हुई ब्रिटिश आर्मी के सामने हथियार डालने लगे. अप्रैल के अंत में पहली डिवीजन के 6000 सैनिकों को छोड़ कर बाकी सभी सैनिकों ने बर्मा छोड़ दिया और आजाद हिन्द फौज अपने पुराने केंद्र सिंगापुर लौट गई. इन छह हजार सैनिकों ने बिना किसी प्रतिरोध के ब्रिटिश आर्मी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. इस तरह जुलाई तक दिल्ली चलो का नारा एक असफल प्रयोग और सैनिक एडवेंचर के तौर पर इतिहास में दर्ज कर लिया गया.

दिल्ली में पेशी हुई, नेहरू ने वकील का चोगा पहना, जनता पागल हो गई इन सैनिकों के लिए

                    आजाद हिंद फौज के सेनानियों के लिए पंडित नेहरू ने कोर्ट में बहस की थी.

जून 1945 में भारत में कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को जेल से छोड़ा जाने लगा. इस बीच आजाद हिन्द फ़ौज के 11 हजार सैनिक युद्ध बंदी के तौर पर उस दिल्ली पहुंचे, जहां पहुंचने के लिए इन लोगों ने कसमें खाई थीं. यहां इनका स्वागत हीरो की तरह हुआ. भारत का कोई ऐसा राजनीतिक दल या विचारधारा नहीं थी जो इन लोगों के पक्ष में खड़ा नहीं था. इन युद्धबंदियों पर लाल किले में मुक़दमा चलाया गया. भूलाभाई देसाई के नेतृत्व में तेजबहादुर सप्रू, आसफअली और काटजू की टीम इस मुकदमे में इन सैनिकों की पैरवी कर रही थी. मुकदमे के पहले दिन वकालत की पढ़ाई के करीब तीस साल बाद नेहरू वकील की वर्दी में इस ट्रायल में मौजूद थे.

इन सैनिकों पर चल रहे मुकदमे के प्रति जनता की सहानुभूति जुड़ गई. यहां तक कि ब्रिटिश सेना में काम कर रहे भारतीय सैनिकों भी इस मामले में आजाद हिन्द फ़ौज के साथ खड़े हो गए. कानपुर, कोहाट, इलाहाबाद, बमरौली की एयरफोर्स इकाइयों ने इन सैनिकों को आर्थिक सहयोग भेजा. पंजाब और संयुक्त प्रान्त में आजाद हिन्द फ़ौज के पक्ष में हो रही जनसभाओं में ब्रिटिश इम्पीरियल आर्मी के लिए काम रहे भारतीय सैनिक भी वर्दी में देखे जाते. नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस के गवर्नर कनिंघम ने तत्कालीन वायसरॉय को लिखा कि राज के लिए अब तक वफादार रहे लोग इस मुदकमे की वजह से ब्रिटिश ताज के खिलाफ होते जा रहे हैं. ब्रिटिश इम्पीरियल आर्मी के कमांडर इन चीफ ने अपने दस्तावेजों में दर्ज किया कि सौ फीसदी भारतीय अधिकारी और ज्यादातर भारतीय सैनिकों की सहानुभूति आजाद हिन्द फ़ौज की तरफ है. इसकी एक वजह नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विमान हादसे में मौत भी थी. जिसने आम जनता की भावनाओं को इन लोगों के पक्ष में कर दिया था.

लड़ाई के मोर्चे पर तैनात आजाद हिंद फौज के सिपाही.

नवमबर 1945 को लाल किले में यह मुकदमा मई 1946 में खत्म हुआ. फैसला आया कि आरोपी मुख्य तीन अफसरों कर्नल शाहनवाज, प्रेम सहगल और गुरुबक्श सिंह ढिल्लो को देश निकाले की सजा दी जाती है. लेकिन इस पर कभी अमल नहीं हुआ. बाकी के सैनिकों पर जुर्माने लगे और तीन महीने भीतर छोड़ दिया गया. इस मुकदमे ने भारत छोड़ो आंदोलन को एक फिर से नए और मजबूत रूप में उभार दिया. इस मायने में देखा जाए तो आजाद हिन्द फ़ौज मोर्चे पर शिकस्त खा कर भी जंग जीत गई.